पुरातात्विक स्रोत किसे कहते हैं | Puraataatvik Srot Kise Kahate hain

यहाँ पर आप यह जान पाएँगे कि पुरातात्विक स्रोत क्या हैं किसे कहते हैं (Puraataatvik Srot kise kahate hain) जो कि पुरातात्विक स्रोत in hindi में विस्तार से बतलाया गया है।

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पुरातात्विक स्रोत किसे कहते हैं (पुरातात्विक स्रोत क्या है)

सामान्य शब्दों में, ये ऐसे स्रोत हैं जिनसे हमें अतीत या इतिहास के बारे जानकारी मिलती है। पुरातात्विक स्रोत मूल रूप से भौतिक साक्ष्य हैं, जैसे कि ऐतिहासिक इमारतें, सिक्के, शिलालेख और अन्य अवशेष जो एक विशिष्ट अवधि के बारे में महत्वपूर्ण और विस्तृत जानकारी प्रदान कर सकते हैं।

पुरातात्विक स्रोतों के (का) उदाहरण

ऐतिहासिक इमारतें, सिक्के, शिलालेख और अन्य अवशेष

  • उपकरण
  • मृदभांड
  • कलाकृतियाँ
  • भवन
  • मुद्रा
  • अभिलेख

पुरातात्विक स्रोत के प्रकार

उपकरण

  • मुख्यत: उपकरणों के आधार पर ही हम पुरापाषाण काल से नव पाषाण काल का अध्ययन कर पाते हैं।
  • पत्थर से बने उपकरणों के बाद जब धातु का प्रयोग होता है तो इसका संबंध सभ्यता के विकास से जोड़ा जाता है।
  • हडप्पा सभ्यता के पतन के साथ ही कांसे का उपयोग विलुप्त हो गया और इसका स्थान ताम्र- पाषाणिक संस्कृति ने ले लिया।

मृदभांड

  • मिट्टी से बना घड़ा, बर्तन, कटोरा, प्याला, गिलास आदिमृदभांड की श्रेणी में आते हैं।
  • मृदभांड का सामान्य या विशेष प्रकार का होना समकालीन प्रौद्योगिकी विकास के साथ-साथ समाज के स्तरीकरण का भी संकेत करता है।

कलाकृतियाँ

  • कलाकृतियों में प्रयुक्त निर्माण सामग्री, विषयवस्तु निर्माण के प्रेरणा स्रोत आदि को देख समझ कर हम उस युग विशेष को जीवन संस्कृति का बहुत हद तक अनुमान लगा सकते हैं।
  • उदाहरण के लिये यदि हम हड़प्पा काल की कलाकृतियों को देखें तो पता चलता है कि वे लोग मिट्टी, सेलखड़ी के पत्थर काँसा आदि का कलात्मक स्तर पर उन्नत प्रयोग कर रहे थे।
  • अनुमानत: आमजन मिट्टी की मूर्तियों व धनी वर्ग प्रस्तर या धात्विक मूर्तियों का उपयोग करते होंगे, इस आधार पर हम समाज में व्याप्त आर्थिक स्तरीकरण का अनुमान लगा सकते हैं।

भवन

  • भवन निर्माण लोक जीवन की घुमंतू प्रवृत्ति में स्थिरता का प्रमाण है। साथ ही यह कृषि अधिशेष व व्यापार वाणिज्य की वृद्धि का भी सूचक है।
  • मौर्यकालीन स्तूप प्राय: ईंटों से निर्मित होते थे और इनमें प्रस्तर के प्रयोग के आधार पर ही सांची और भरहुत के स्तूपों में मौयोंत्तरकालीन योगदान का भी अध्ययन किया जाता है।
  • यद्यपि पुष्यमित्र शुग को बौद्ध स्रोतों में बौद्धों का दमनकर्ता बताया गया है, किंतु यदि हम साँची और भरहुत के स्तूपों के उत्कीर्णित लेखों का अध्ययन करें तो ये साफ प्रमाणित होता है कि ये शुगकाल में बने हैं, जो मौयों की तुलना में कलात्मक संवर्द्धन का प्रमाण से हैं।

मुद्रा

  • सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहते हैं। हमारे आरंभिक सिक्कों पर तो कुछेक प्रतीक मिलते हैं, पर बाद के सिक्कों पर राजाओं और देवताओं के नाम तथा तिथियाँ भी उल्लिखित मिलती हैं जिससे हमें काल निर्धारण में काफी सहायता मिलती है।
  • इन सिक्कों के प्राप्त होने के स्थानों से यह ज्ञात होता कि किसी विशेष स्थान पर इन सिक्कों का चलन था व सिक्कों को मात्रा यह निर्धारित करने में सहायक होती है कि वहा वाणिज्य-व्यापार की क्या स्थिति थी।
  • सिक्कों के आधार पर ही कई राजवंशों के इतिहास का पुनर्निर्माण संभव हुआ है, विशेषतः उन शासकों का जो उत्तरी अफगानिस्तान से भारत पहुँचे और जिन्होंने ईसा पूर्व दूसरी से पहली शताब्दी तक यहाँ शासन किया।

अभिलेख

  • अभिलेख के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र (एपिग्राफ़ी) कहते हैं।
  • अभिलेख ताम्रपत्रों, भुहरों, प्रस्तर स्तंभों, स्तूपों, चट्टानों तथा मंदिर की दीवारों आदि पर उत्कीर्णित ऐसे लेख हैं जो स्थायी महत्त्व के हैं और समयानुसार इनमें बदलाव नहीं किया जा सकता है।
  • यद्यपि इनमें भाषा और लिपि के माध्यम से ब्यौरा दिया जाता है। अभिलेखों से हमें कई सारी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं, जैसे- प्रस्तर या धातु का ज्ञान, जिस पर ये लेख उत्कीर्णित हैं।
  • उदाहरण के लिये अशोक का एकाश्म पत्थर से निर्मित स्तंभ लेख जहाँ उसके काल की प्रस्तर कला का प्रमाण है, वहीं चन्द्रगुप्त का महरौली स्तंभ उस युग की लौह कला का।
  • यदि हम पश्चिमोत्तर क्षेत्रों में अशोक के अभिलेखों पर दृष्टिपात करें तो इनमें स्थानीय प्रभाव साफ दिखता है जो उन क्षेत्रों में शासन के केन्द्रीकरण की व्यवस्था की दुर्बलता की ओर संकेत करता है।

पुरातात्विक स्रोत (स्रोतों) का महत्व

यह हमें निष्पक्ष जानकारी प्रदान करता है।

पुरातात्विक स्रोतों ने एक क्षेत्र के इतिहास के निर्माण या/और पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।पुरातात्विक स्रोत ने हमारे अतीत के बारे में हमारे ज्ञान को बढ़ाया और महत्वपूर्ण सामग्री भी प्रदान की, जो हमें अन्यथा प्राप्त नहीं हो सकती थी।

पुरातात्विक स्रोत किसे कहते हैं (पुरातात्विक स्रोत क्या है)

सामान्य शब्दों में, ये ऐसे स्रोत हैं जिनसे हमें अतीत या इतिहास के बारे जानकारी मिलती है। पुरातात्विक स्रोत मूल रूप से भौतिक साक्ष्य हैं, जैसे कि ऐतिहासिक इमारतें, सिक्के, शिलालेख और अन्य अवशेष जो एक विशिष्ट अवधि के बारे में महत्वपूर्ण और विस्तृत जानकारी प्रदान कर सकते हैं।

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Written by GKTricksIndia